समाज से कमाने वालों, बांटकर खाना सीखो

अमीरों के घर और होटलों पर
मनाते जश्न भला
गरीब कहाँ देख पाते हैं
पर भरते हैं जो आहें
अपनी गरीबी देखकर
उसे अमीर भी कहाँ सुन पाते हैं
दौलत से खुशियाँ खरीदी
जा सकती हैं पर दुआएं नहीं
पर आहें भी व्यर्थ नहीं जातीं
कहीं मन में ही रहतीं तो
कहीं अपराध के रूप में सामने आते हैं
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जब दौलतमंद हो जाते हैं तंगदिल
तब गरीब भी हो जाते हैं बेदिल
समाज से कमाने वालों
बांटकर खाना सीखो
समाज पर आने वाली मुसीबतें
सबसे पहले दौलत के शिखर पर बैठे
लोगों पर ही करती हैं हमला
तब हमदर्द नहीं बनता किसी का दिल
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